बधाई के मुक्तक

 ख़ुशियों की पाती बनकर, ख़ुशियाँ फैलाओ, मस्त रहो
ख़ुशबू की मानिन्द बिखरकर, जग महकाओ, मस्त रहो
आज के इस पावन अवसर पर यही दुआ करते हैं हम
सबके प्यारे, राज-दुलारे, मौज मनाओ, मस्त रहो

नवीन सी चतुर्वेदी के दोहे

प्रेम प्रीत के दोहे
 प्रीत न कोई युद्ध है, न ही हार या जीत
श्वास-श्वास विश्वास हो, तभी सफल है प्रीत
 
निर्गुण-सगुण विधान पर, मत कीजै तकरार
मुख पर दिखता है स्वयं, प्रेम तत्व साकार

सॉनेट - मुरली वाला कृष्ण कन्हैया

 साँकरी सी खोर गहवर वन की थी वो
जिसमें सखियों संग राधा चल रही थी
यूँ तो ना ना कर रही थी वह मिलन को
किन्तु मन में आस भी कुछ पल रही थी

गीत - राखी

 सम्बन्धों की परिभाषा है,
रिश्तों का गुणगान है राखी ।
अखिल विश्व में समरसता की,
सर्वश्रेष्ठ पहिचान है राखी ।।

गीत - पर्वों का पर्याय हिन्द है

 अगर ज़िन्दगी काया है तो उपटन हैं त्यौहार ।
शाश्वत जीवन दर्शन का अवगाहन हैं त्यौहार ॥

गीत - शरद पूर्णिमा

 नभ रोशन, अंतर्मन रोशन, कण-कण है सुखदायी ।
लिये सँदेशा दीवाली का, शरद पूर्णिमा आयी ।।

गीत - फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं

 मुझको तुझसे रंज नहीं है, तुझको मुझसे द्वेष नहीं ।
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं ॥

गीत - चोट खा कर भी शराफत कर रहे हैं आदमी

 सच तो ये ही है इनायत कर रहे हैं आदमी ।
चोट खा कर भी शराफत कर रहे हैं आदमी ॥

गीत - दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नहीं

 लुट गये खजाने और गुन्हगार कोई नहीं ।
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नहीं ॥

गीत - दिल में यही तमन्ना है सारी दुनिया की सैर करूँ

 देश-गाँव-शहरों-कस्बों से अनुभव का हर पृष्ठ भरूँ ।
दिल में यही तमन्ना है सारी दुनिया की सैर करूँ ॥

गीत - कोई तो जा के समझाये हमारे कर्णधारों को

 कोई तो जा के समझाये हमारे कर्णधारों को ।
चलो मिल कर भटकने से बचाएँ होनहारों को ॥

गीत - वो है भगवान इन्सान के रूप में

 एक शब्द अहसान है, एक शब्द उपकार ।
अहसाँ करते आदमी, प्रभू करें उपकार ॥

गीत - हिन्दी-उर्दू के झगड़ों में रोमन बाजी मार गयी

 तहजीबों के टकरावों में फैशन बाजी मार गयी ।
हिन्दी-उर्दू के झगड़ों में रोमन बाजी मार गयी ॥

नवगीत - मजदूरी का मोल

 मजदूरी का मोल
यहाँ अधिक, पर
वहाँ लगे कम
ये कैसा है झोल
ओ भैया ये कैसा है झोल

नवगीत - यमुना कहे पुकार

 यमुना कहे पुकार
बिना तुम्हारे नटवर नागर
कौन करे उद्धार

नवगीत - छंदों के मतवाले हम

 छंदों के मतवाले हम
है प्यार हमें भाषाओं से
प्रारूपों के रखवाले हम

नवगीत - आप हम सब खुश रहें

खेत खलिहानों में
पैदावार हो,
हसरतों का ना कहीं
व्यापार हो,
बाल बच्चों को मिले
शिक्षा अमित,
बहन बेटी घूम पाएँ
भय रहित,
हो तरक्की और नदियाँ भी बहें ।
आप हम सब खुश रहें ॥

नवगीत - ज्योति जला जगमग

 ज्योति जला जगमग.............
 
पर्व प्रकाश पुंज का आया
बाल-अबाल हृदय हरषाया
नर-नारी सब चहक रहे हैं
बन के नभ के खग...............
ज्योति जला जगमग

नवगीत – दीपावली दीपावली दीपावली

 हर साल मेरी रूह को,
कर डालती है बावली ।
दीपावली दीपावली दीपावली ॥

नवगीत – सड़क पर

 चलें रीति से
नीति निभाते
मीत सड़क पर

नवगीत - आज के यही समाचार हैं

 द्वंद-द्वेष-दुख दुराचार हैं
भाँति भाँति के हहाकार हैं
आज के यही समाचार हैं

नवगीत - चल चलें इक राह नूतन

 चल चलें इक राह नूतन

नवगीत - लुप्त हों न पलाश

 बिन तुम्हारे होलिका त्यौहार
था इक कल्पना भर
हाट में बाकायदा
तुम स्थान पाते थे बराबर
अब कहाँ वे रंग
वे रंगीन भू-आकाश
लुप्त हों न पलाश

कविता - कुकर की सीटी

 कुकर से गैस
रिस रही थी हौले-हौले
बीच-बीच में
सुनाई भी पड़ रही थी
सीटी की आवाज
उस की परिसीमाओं की आगाही
मगर सुना नहीं किसी ने

कविता - बरगद – वटवृक्ष

 यूँही नहीं बने हमारे संस्कार
कुछ न कुछ तो है हर रीति रिवाज के पीछे
जरूरत है उन्हें समझने की

होली के सवैया छन्द

काहु कों बाँध्यौ नहीं जग आपु हि प्रीत की डोर सों आय बँध्यौ है
हाथ’न हाथ खरीदौ गयौ चितचोर सखी बिन मोल बिक्यौ है
नित्य नवीन विधी हिय हार सनेहि’न कौ मन जीत लयौ है
कारे पै काहू कौ रंग चढ्यौ नहिं कारे के रंग’न विश्व रँग्यौ है

नवीन सी चतुर्वेदी के कुण्डलिया छन्द

 कुण्डलिया छन्द विधान
कुण्डलिया जादू भराछन्द श्रेष्ठ श्रीमान 
दोहा रोला का मिलनहै इसकी पहिचान 
है इसकी पहिचान विषय का होना रोचक 
आदि-अंत सम-शब्दसाथ बनता विस्फोटक 
लल्ला चाहे औरचाहती इसको ललिया 
सब का है सिरमौर छन्दप्यारेकुण्डलिया 

छन्द - बचपन की सुहानी यादें

 दादी और दादा संग मौजड़ियाँ लूट कर,
नानी और नाना संग गप्पें भी लड़ाते थे।
 
पास के ही नहीं दूर दूर के भी रिश्तेदार,
हर तहवार पर बोहनी कराते थे।

छन्द - सत्तर-अस्सी के दशक वाली होली

कहाँ गईं वे मस्तियाँ, कहाँ गई वह मौज
वे केशर की क्यारियाँ, गोबर वाले हौज
गोबर वाले हौज बीच डुबकी लगवाना
मेसू, मठरी, खीर’मोन के थाल उड़ाना
बतला तो ऐ यार जमाने कहाँ गईं वे

छन्द - अंगदान से भी श्रेष्ठ-दान कन्यादान है

 जहाँ-जहाँ जाइयेगा वहाँ-वहाँ पाइयेगा,
दुनिया में ठौर-ठौर इनके निशान हैं ।
 
मानवीय-सभ्यता के प्रहरी समान नित्य,
बेटी को सिखाते दहलीज़ के विधान हैं ।।

कविता - पेड़ और पर्यावरण

कटते जा रहे हैं पेड़ पीढी दर पीढी
बढता जा रहा है धुआँ सीढी दर सीढी
अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये,
चिन्तित है कागजी समुदाय

कविता - करवा चौथ

 बदलता संसार, बदलता व्यवहार
बदलते सरोकार, बदलते संस्कार
बदलते लोग, बदलते योग
बदलते समीकरण, बदलते अनुकरण
बदलता सब कुछ
पर नहीं बदलता

कविता - कलम के सिपाही, मुंशी प्रेमचन्द

 क़लम के जादूगर!
अच्छा है आज आप नहीं हैं
अगर होते, तो, बहुत दुखी होते
 
आप ने तो कहा था -

कविता - कंक्रीटीकरण

 खेतों को काट के इमारतें
बनती ही जा रही हैं
जहाँ देखो –बेइन्तेहा तनती ही जा रही हैं
 
चिन्ता होती है
अगर कोन्क्रीट के ये जंगल युंही फैलते जायेंगे

कविता - ऊँट एक योजनाकार

 यों तो ऊँट
एक बुद्धिमान योजनाकार है
जो रेगिस्तान की गरमी से बचने के लिये
अपने पेट की पोटली में पानी भर के रखता है
और जब उसे प्यास लगती है

कविता - मैं और हवा

 मैंने हवा को महसूस किया -
शून्य को सम्पन्न बनाते हुए,
सरहदों के फासले मिटाते हुए,
खुशबुओं को पंख लगाते हुए,
आवाज की दुनिया सजाते हुए,
बिना कहीं भी ठहरे, यायावर जीवन बिताते हुए,
और फिर मुझे खुद पर तरस आया.
 
मैं - यानि कि एक आदम जात,

कविता - प्रेम शांति का द्वार बने

 कुछ अपनी कुछ औरों की । बातें कलियों-भँवरों की ।
तन आकुल औ व्याकुल मन । राम कहानी सा जीवन ॥
 
इश्क मुहब्बत की बातें । कम पड़तीं जिन को रातें ।
दिल का मर्ज अनोखा है । फिर भी लगता चोखा है ॥

कविता - नीम

 रंग-त्वचा को परिभाषित कर नाहक स्वाद चखाऊँ क्या
हर टहनी में कितनी पत्ती होती हैं गिनवाऊँ क्या
किस मौसम का इस पर कैसा असर पड़े बतलाऊँ क्या
यार सैंकड़ों गुण हों जिस में उस की गाथा गाऊँ क्या

कविता - हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ

 ये शोरगुल बेइन्तिहा दम घोंटता धुआँ
हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ
 
उस गाँव की मिट्टी में कीटाणु घने दिखे
इस वासते हम ने शहर के फैसले लिखे

कविता - हमें उम्र भर मम्मी पापा के सँग में ही रहना है

 प्यारी प्यारी मम्मी जब भी अपनी धुन में आती थी
गोदी में ले कर के हमको ट्विंकल ट्विंकल गाती थी
गोल गोल रसगुल्ले जैसे गालों को सहलाती थी
पकड़ हमारी नक्को रानी हँसती और हँसाती थी

कविता - कड़ी दिवाली दरवाजे पर

 सावन बीता भादों बीता, क्वार मास भी जाए रीता
खड़ी दिवाली दरवाज़े पर, सजना तुम कब आओगे घर
 
दिल, दीपक सा जलता पल-छिन, राह तकूँ तारीख़ें गिन-गिन
जल्दी आऊँगा दोबारा, सन्देशा था यही तुम्हारा

घनाक्षरी छन्द विधान

 आठ आठ तीन बार, और सात एक बार,

इकतीस अक्षरों का योग है घनाक्षरी ।

 

सोलह-पंद्रह पर, यति का विधान मान,

मंगल-करण, शुभ-योग है घनाक्षरी ।

 

अन्तिम अक्षर सदा, दीर्घ रखिये 'नवीन',

कविता जोगनिया का, जोग है घनाक्षरी ।

 

शायद ही कोई कवि, इसको न जानता हो,

छंदों में तो जैसे राज-भोग है घनाक्षरी ॥

कविता - मैं मैं मैं

 मैं मैं मैं
ये बकरी वाली 'मैं-मैं' नहीं है
 
ये वह 'मैं' है
जो आदमी को शेर से बकरी बना देती है

कविता - प्यारे किस के लिये लिखते हो

 तुम लिखते हो, में पढता हूँ, मैं कहता हूँ, तुम सुनते हो ।
मुझसे मेरा अन्तस पूछे, प्यारे किस के लिये लिखते हो ॥

सोरठे

 हम ही थे नादान, क्या बतलाएँ आप को ।
सौंपी जिसे दुकान, वही तिजोरी ले उड़ा ॥
 
चुप करिये श्रीमान, हो-हल्ला किस बात का ।
गिरा भले इंसान, लोहा तो उड़ने लगा ॥

मुक्तक - मेरा हिन्दोसताँ सब से अलग सब से निराला है

 मेरा हिन्दोसताँ सब से अलग सब से निराला है।
ये ख़ुशबूओं का गहवर है बहारों का दुशाला है।
अँधेरो तुम मेरे हिन्दोसताँ का क्या बिगाड़ोगे।
मेरा हिन्दोसताँ तो ख़ुद उजालों का उजाला है॥

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

              संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी
(ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)