प्रीत न कोई युद्ध है, न ही हार या जीत
श्वास-श्वास विश्वास हो, तभी सफल है प्रीत
निर्गुण-सगुण विधान पर, मत कीजै तकरार
मुख पर दिखता है स्वयं, प्रेम तत्व साकार
जात-पात समझे नहीं, न ही पुण्य या पाप
प्रेम उसी को मिल सका, जिसके हिरदय आप
या तो है या है नहीं, यही प्रेम का सार
ये सौदा है नक्द का, होता नहीं उधार
क्षमा, शील, करुणा, विनय, के लेकर औजार
प्रेम प्रजापति गढ़ रहा, पल-पल
शिल्प अपार
रंगरेज बनकर हमें, प्रेम कर रहा दंग
रंगों को भी रँग रहा, बदल-बदल कर
रंग
घुला जगत में प्रेम तो, आम हो गया खास
विष पी कर भी हो रहा, अमृत का आभास
अद्भुत आविष्कार है, शुद्ध प्रेम की डोर
बाँध रखा है कुल जगत, है यद्यपि कमजोर
जब-जब हो बीमार मन, बनकर वैद्य-हकीम
प्रेम चखाता है हमें, किशमिश, मिश्री, नीम
प्रेम चकोरा भूमि का, प्रेम गगन का इन्दु
यही बिन्दु का सिन्धु है, यही सिन्धु का बिन्दु
यदि हम सबसे कर सकें, पंच-तत्व सी प्रीत
कण-कण स्वयं सुनाएगा, मधुर-मधुर संगीत
आँख मूँद कर देखिए, कुदरत का यह कृत्य
करुणा वेणु बजा रही, प्रेम कर रहा नृत्य
यही सार समझा गये, बड़े-बड़े विद्वान
कोई भी मौसम रहे, प्रेम-चदरिया
तान
प्रेम काल की ताल पर, बजे यथा मिरदंग
रहे हृदय के संग में, सजे अंग-प्रत्यंग
निश्छल, निर्मल भाव की, करी प्रेम ने पुष्टि
तभी सृष्टि की शाख पर, खिली आत्म-सन्तुष्टि
सुरभित होती सुश्रुषा, यही जगत की रीत
जब अंकुर पौधा बना, समझ आ सकी प्रीत
बतरसिया दोहे
बतरस
लालच बतरसी ख़ूब बनाते बात
कभी झूमते बात पर कभी कभी
बेबात
बात बनाते जो यहाँ बढ़ा चढ़ा कर बात
सब समझाते हैं उन्हें सुना सुना कर बात
बात बात क्या कर रहे यही बात की बात
बात बनाये बात को बात बिगाड़े बात
बात बनेगी किस तरह अगर हौसले पस्त
गोली मारो फिक्र को रहो हमेशा मस्त
बिना बात की बात से क्यों होना बेचैन
जैसे दिन है ढल रहा ढल जायेगी रैन
बिना बात की बात का क्यों करना विश्वास
बोझा जितना कम रहे उतना सुगम प्रवास
दोहे – सजनी सजन
कल कल
कहते कट गया कितना काल कराल
अब तो आ जा जोगिया जोगन है
बेहाल
प्रीतम पाती पढ़ रहे प्रीत पारखी नैन
जोगन का सुख चैन ही जोगी का सुख चैन
सजनी सजना से कहे सजन सजा कर साज
जनम जनम की आस को पूरी कर दो आज
अपनी मर्जी से भला कब होवै बरसात
नाहक उससे बोल दी अपने दिल की बात
प्रीत चुनरिया में कहाँ लगते हैं पैबन्द
हम सच्चे दिलदार हैं क्यों खाएं सौगन्ध
सब, सब के आधीन हैं फिर भी भेद महीन
कोई जल बिनु मीन है कोई जल बिनु मीन
अन्य
बीज
बुवाई सों प्रथम सोचौ तनिक हजूर
आँगन
में तुलसी लसै शोभत नाहिं बबूर
सचमुच
हर तस्वीर है उसकी ही तस्वीर
देखो
तो दिख जाएँगे रावण में रघुवीर
इसमें
कोई शक नहीं सभी यहाँ धनवान
कोई
संचय कर बना, कोई दे कर दान
रब
ने जब दे ही दिया हमें नदी का रूप
बहते
रहना है सतत छाँव रहे या धूप
क्या
लाया था साथ में क्या जायेगा साथ
है
तुझमें सामर्थ्य तो बढ़ा मदद का हाथ
अकड़
छोड़ कर सोच में पैदा कर कुछ लोच
क्या
खोया ये भूलकर क्या पाया ये सोच
बाग
बाग गुलजार है राग राग मधु राग
जाग, जाग कर, जाग कर, जाग-जाग कर जाग
सत्य
सनातन तत्व है इस पर नहीं विवाद
किन्तु
चलन इसका घटा हरिश्चन्द्र के बाद
तने
हुए हैं तान कर निष्कासन के तीर
भूल
गये रघुनाथ भी लंका वाली पीर
हैं
शिकार अब भी वही जिनका नहीं क़ुसूर
गौतम
भी मजबूर थे हम भी हैं मजबूर
अनुभव
के अनुसार ही होते हैं उद्गार
जिसने
देखीं छह ऋतू कैसे कह दे चार
वे, जिनने देखा नहीं, या जो सन्त मलूक
मलमल
भी उनको लगे बस कपड़े का टूक
दो
लोगों के भाग्य में नहीं लिखा रसपान
एक
जिसे अनुभव नहीं दूजा अति-विद्वान
इस
कारण भी क’इ दफा हम रहते हैं मौन
वे
जो स्वयं गणेश हैं उन्हें बुद्धि दे कौन
वही
हमारी ज़िन्दगी, और वही मामूल
गीले
कपड़े तार पर फाँक रहे हैं धूल
घाटे
का सौदा रहा, बारिश का ब्यौपार
गरजे
सौ सौ बादरा बरसे बस दो चार
निखर
गयीं तनहाइयाँ, बिखर गये हालात
तरु
को तनहा कर गये झर झर झरते पात
पूछा
था बाजार से बोल हमारा मोल
तारीफों
के पुल बंधे प्रश्न हो गया गोल
मुखमण्डल
सबके जहाँ, दिखते
हों ख़ुशहाल
यारों
की उस बज़्म को कहते हैं चौपाल
वही
पुरानी पीर है नहीं नवीनवसाद
कुछ
लोगों ने खेत को समझ रखा है खाद
यह
जीवन वैसौ कहाँ जियौ जु यमुना तीर
यै
चीनी की खीर है वौ बूरे की खीर
सर्दी में लागे सुखद, धीमी-धीमी आँच ।
मनुहारों की संहिता, हौले-हौले बाँच ॥
तब से अब तक सौ गुना, फैल चुका संसार ।
सभ्य-सभाओं का मगर, बढा नहीं आकार ॥
फिर बेशक़ तू भाड़ की, कमी गिनाना लाख ।
लेकिन पहले भाड़ के भुने चने
तो चाख ।।
अक्षर मेरा इष्ट है, शक्ति, शब्द-सन्धान
।
गुर सीखे वाल्मीकि से, ये मेरी पहिचान ॥
पाते हैं मोती रकम, लाखों में दो-चार ।
दो-चारों की होड़ में, मरा जाय संसार ॥
झरनों से जब जा मिला, शीतल मंद समीर ।
कहीं लुटाईं मस्तियाँ, कहीं बढ़ाईं पीर ।।
अपनी मरज़ी से भला, कब होवै बरसात ?
नाहक उस से बोल दी, अपने दिल की बात ।।
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