छन्द - बचपन की सुहानी यादें

 दादी और दादा संग मौजड़ियाँ लूट कर,
नानी और नाना संग गप्पें भी लड़ाते थे।
 
पास के ही नहीं दूर दूर के भी रिश्तेदार,
हर तहवार पर बोहनी कराते थे।
 
सच जानिये हमारी छोटी-छोटी ख़ुशियों पे,
पास औ पड़ौस वाले फूले न समाते थे।
 
हाँ मगर एक और बात है कि यही लोग,
भूल करने पे हमें डाँट भी लगाते थे॥
 
 
 
डाँटने के बाद वाला प्यार मिलता हो जिसे,
वही जानता है प्यार कैसे किया जाता है।
 
सूई में धागा पिरो के फूलों को बनाते हुये,
प्यार का रूमाल हौले-हौले सिया जाता है।
 
हृदय की बावड़ी से थोड़ा-थोड़ा खींच कर,
प्यार का अमृत हौले-हौले पिया जाता है।
 
सौ बातों की एक बात यूँ समझ लें 'नवीन',
प्यार पाना हो तो विष-पान किया जाता है॥
 
 
 
विष का वमन कभी कीजिये नहीं जनाब,
कीजिये तो अमारित धार भी बहाइये।
 
अमृत बहाना यदि सम्भव न हो सके तो,
प्यार के दो मीठे-मीठे बोल ही सुनाइये।
 
प्यार के दो मीठे बोल भी न बोल पाओ यदि,
मुस्कुराते हुये दिलों में जगह पाइये।
 
ये भी जो न हो सके तो ऐसा कीजियेनवीन’,
जा के किसी दरपन से लिपट जाइये॥

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