कविता - प्रेम शांति का द्वार बने

 कुछ अपनी कुछ औरों की । बातें कलियों-भँवरों की ।
तन आकुल औ व्याकुल मन । राम कहानी सा जीवन ॥
 
इश्क मुहब्बत की बातें । कम पड़तीं जिन को रातें ।
दिल का मर्ज अनोखा है । फिर भी लगता चोखा है ॥
 
प्यार बिना सूना जीवन । स्नेह सिक्त जीवन बंधन ।
प्रेम तीर्थ की पूजा है । काम न ऐसा दूजा है ॥
 
प्रेम जीव की चाहत है । प्रेम सभी की हसरत है ।
प्रेम पक्ष ही शास्वत है । विश्व, प्रेम की मूरत है ॥
 
जिसका व्याप सघन इतना । जिसका अर्थ वृहद उतना ।
मानवता की जो रचना । वह फिर क्यों जंजाल बना ॥
 
प्रेम तत्व जब बढ़ता है । साथ दम्भ भी चढ़ता है ।
नर अपनों से लड़ता है । यही दम्भ दुःख गढ़ता है ॥
 
बँटवा दो लिख कर पर्चे । करो बन्द बेढब चर्चे ।
प्रेम प्रेम बस प्रेम रहे । दिल में ममता क्षेम रहे ॥
 
हर मनुष्य प्रेमातुर हो । कहीं न कोइ भयातुर हो ।
प्रेम भाल का चन्दन हो । प्रेम दिलों की धड़कन हो ॥
 
यह समष्टि का सार बने । संसृति का आधार बने ।
प्रेम बात व्यवहार बने । प्रेम शांति का द्वार बने ॥

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