सोरठे

 हम ही थे नादान, क्या बतलाएँ आप को ।
सौंपी जिसे दुकान, वही तिजोरी ले उड़ा ॥
 
चुप करिये श्रीमान, हो-हल्ला किस बात का ।
गिरा भले इंसान, लोहा तो उड़ने लगा ॥
 
क्या बतलाएँ हाल, छूते ही झुलसे बदन ।
गोरी तेरे गाल, फूल नहीं, अंगार हैं ॥
 
नर्म, गुनगुनी धूप, खिले जिस तरह पौष में ।
ऐसा सौम्य-स्वरूप, केवल बिटिया में दिखे ॥
 
सच पर नहीं विवाद - किन्तु झूठ ये भी नहीं ।
हरिश्चन्द्र के बाद - सत्यवादिता कम हुई ॥
 
वे अपना अवसाद - भला भूलते किस तरह ।
बारह वर्षों बाद - जिन को लाक्षागृह मिला ॥
 
निष्कासन के तीर - ले कर सब तैयार हैं ।
लंका वाली पीर - कोई भी हरता नहीं ॥
 
कन्या का कौमार्य - उस का ही जिम्मा नहीं ।
सुनो गौर से आर्य! - ये हम पर भी फ़र्ज़ है ॥
 
हरिक सार का सार - दो बातों में है निहित ।
मधुकर की मनुहार - और कली का उन्नयन ॥
 
क्या बतलाऊँ यार - पहले हर दिन पर्व था ।
लेकिन अब तो भार - लगते हैं त्यौहार भी ॥
 
कैसे होती बन्द - पुरखों की छेड़ी बहस ।
हम बोले मकरन्द - वे पराग पर अड़ पड़े ॥
 
नहिं प्रसिद्धि की प्यास, न ही भूख ऐश्वर्य की ।
बस जब तक है श्वास, हाथ-पाँव चलते रहें ॥
 
ढूँढ रहे हैं आप, शिस्त और तहज़ीब गर ।
तो छंदों की छाप, अंकित कर दें हर जगह ॥
 
मावस का 'तम-पाश', हम कब तक सहते भला 
जगर-मगर आकाश, इक दिन तो कर ही दिया ॥

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