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नवगीत - लुप्त हों न पलाश

 बिन तुम्हारे होलिका त्यौहार
था इक कल्पना भर
हाट में बाकायदा
तुम स्थान पाते थे बराबर
अब कहाँ वे रंग
वे रंगीन भू-आकाश
लुप्त हों न पलाश