कविता - कलम के सिपाही, मुंशी प्रेमचन्द

 क़लम के जादूगर!
अच्छा है आज आप नहीं हैं
अगर होते, तो, बहुत दुखी होते
 
आप ने तो कहा था -
कि, खलनायक तभी मरना चाहिए,
जब, पाठक चीख चीख कर बोले,
मार - मार - मार इस कमीने को|
 
पर, आज कल तो,
खलनायक क्या? नायक-नायिकाओं को भी,
जब चाहे तब मार दिया जाता है
फिर जिंदा कर दिया जाता है|
और फिर मार दिया जाता है|
और फिर,
जनता से पूछने का नाटक होता है-
कि अब, इसे मरा रखा जाए? या जिंदा किया जाए?
 
सच,
आप की कमी, सदा खलेगी हर उस इंसान को,
जिसे मुहब्बत है,
साहित्य से, सपनों से, स्वप्नद्रष्टाओं, समाज से,
पर समाज के तथाकथित सुधारकों से नहीं|
 
हे कलम के सिपाही, आज के दिन
आपका सब से छोटा बालक,
आप के चरणों में अपने श्रद्धा सुमन सादर समर्पित करता है|

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