कविता - नीम

 रंग-त्वचा को परिभाषित कर नाहक स्वाद चखाऊँ क्या
हर टहनी में कितनी पत्ती होती हैं गिनवाऊँ क्या
किस मौसम का इस पर कैसा असर पड़े बतलाऊँ क्या
यार सैंकड़ों गुण हों जिस में उस की गाथा गाऊँ क्या
 
नीम समान विटप ‘चीनीबेरी’ विषधर कहलाता है
विष हट जाये तो यूँ समझो नीम वही हो जाता है
नीम सदैव जड़ों को ढूँढ व्यथा का मूल मिटाता है
किन्तु अधिक सेवन इसका नर को कापुरूष बनाता है
 
बदन मुसाफिर, दुनिया सागर, जिस में चलता नीम जहाज
बदन परिन्दा, दुनिया अम्बर, नीम जहाँ पर है परवाज
ऐसे गुणकारी तरुवर पर कहिये क्यों न करें हम नाज
नीम हमारा दुनिया भर के सारे पेड़ों का सरताज

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