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नवीन सी चतुर्वेदी के दोहे

प्रेम प्रीत के दोहे
 प्रीत न कोई युद्ध है, न ही हार या जीत
श्वास-श्वास विश्वास हो, तभी सफल है प्रीत
 
निर्गुण-सगुण विधान पर, मत कीजै तकरार
मुख पर दिखता है स्वयं, प्रेम तत्व साकार

नवगीत - छंदों के मतवाले हम

 छंदों के मतवाले हम
है प्यार हमें भाषाओं से
प्रारूपों के रखवाले हम

होली के सवैया छन्द

काहु कों बाँध्यौ नहीं जग आपु हि प्रीत की डोर सों आय बँध्यौ है
हाथ’न हाथ खरीदौ गयौ चितचोर सखी बिन मोल बिक्यौ है
नित्य नवीन विधी हिय हार सनेहि’न कौ मन जीत लयौ है
कारे पै काहू कौ रंग चढ्यौ नहिं कारे के रंग’न विश्व रँग्यौ है

नवीन सी चतुर्वेदी के कुण्डलिया छन्द

 कुण्डलिया छन्द विधान
कुण्डलिया जादू भराछन्द श्रेष्ठ श्रीमान 
दोहा रोला का मिलनहै इसकी पहिचान 
है इसकी पहिचान विषय का होना रोचक 
आदि-अंत सम-शब्दसाथ बनता विस्फोटक 
लल्ला चाहे औरचाहती इसको ललिया 
सब का है सिरमौर छन्दप्यारेकुण्डलिया 

छन्द - बचपन की सुहानी यादें

 दादी और दादा संग मौजड़ियाँ लूट कर,
नानी और नाना संग गप्पें भी लड़ाते थे।
 
पास के ही नहीं दूर दूर के भी रिश्तेदार,
हर तहवार पर बोहनी कराते थे।

छन्द - सत्तर-अस्सी के दशक वाली होली

कहाँ गईं वे मस्तियाँ, कहाँ गई वह मौज
वे केशर की क्यारियाँ, गोबर वाले हौज
गोबर वाले हौज बीच डुबकी लगवाना
मेसू, मठरी, खीर’मोन के थाल उड़ाना
बतला तो ऐ यार जमाने कहाँ गईं वे

छन्द - अंगदान से भी श्रेष्ठ-दान कन्यादान है

 जहाँ-जहाँ जाइयेगा वहाँ-वहाँ पाइयेगा,
दुनिया में ठौर-ठौर इनके निशान हैं ।
 
मानवीय-सभ्यता के प्रहरी समान नित्य,
बेटी को सिखाते दहलीज़ के विधान हैं ।।

घनाक्षरी छन्द विधान

 आठ आठ तीन बार, और सात एक बार,

इकतीस अक्षरों का योग है घनाक्षरी ।

 

सोलह-पंद्रह पर, यति का विधान मान,

मंगल-करण, शुभ-योग है घनाक्षरी ।

 

अन्तिम अक्षर सदा, दीर्घ रखिये 'नवीन',

कविता जोगनिया का, जोग है घनाक्षरी ।

 

शायद ही कोई कवि, इसको न जानता हो,

छंदों में तो जैसे राज-भोग है घनाक्षरी ॥

सोरठे

 हम ही थे नादान, क्या बतलाएँ आप को ।
सौंपी जिसे दुकान, वही तिजोरी ले उड़ा ॥
 
चुप करिये श्रीमान, हो-हल्ला किस बात का ।
गिरा भले इंसान, लोहा तो उड़ने लगा ॥