मुझको तुझसे रंज नहीं है, तुझको
मुझसे द्वेष नहीं ।
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं ॥
मेरी पीड़ा- तेरे आँसू, तेरा सुख - मेरी मुस्कान ।
तेरी राहें - मेरी मंजिल, मेरा दिल - तेरे अरमान ।
मेरा घर - तेरा चौबारा, तेरा कूचा - मेरी शान ।
दौनों ही कहते रहते हैं, मानव - मानव एक समान ।
फिर हम कैसे पृथक हुए? मत में जब अन्तर लेश नहीं ।
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं ॥
कौन सनातन है? प्यारे - इस मुद्दे में कुछ जान नहीं ।
पारस्परिक समन्वय से, हम दौनों ही अनजान नहीं ।
क्या तुझको - क्या मुझको, वे सब पहली बातें ध्यान नहीं ।
दौनों जानें, कुछ इक बातें, होती कभी समान नहीं ।
कया फिजूल बातों से, तेरे दिल को पहुँचे ठेस नहीं ।
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं ॥
आ,
पल भर मिल बैठ जरा,
सुन ले मन की बातें मेरी ।
खुदगरजों का बहिष्कार कर, बात सुनूँगा मैं तेरी ।
सुलझा लें गुत्थी, सदियों से, अनसुलझी हैं बहुतेरी ।
आज नहीं, तो कभी नहीं, कल फिर हो जायेगी देरी ।
क्या तेरे आराध्य देव का, एक नाम, 'अखिलेश' नहीं ।
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं ॥
तेरी राहें - मेरी मंजिल, मेरा दिल - तेरे अरमान ।
मेरा घर - तेरा चौबारा, तेरा कूचा - मेरी शान ।
दौनों ही कहते रहते हैं, मानव - मानव एक समान ।
फिर हम कैसे पृथक हुए? मत में जब अन्तर लेश नहीं ।
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं ॥
पारस्परिक समन्वय से, हम दौनों ही अनजान नहीं ।
क्या तुझको - क्या मुझको, वे सब पहली बातें ध्यान नहीं ।
दौनों जानें, कुछ इक बातें, होती कभी समान नहीं ।
कया फिजूल बातों से, तेरे दिल को पहुँचे ठेस नहीं ।
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं ॥
खुदगरजों का बहिष्कार कर, बात सुनूँगा मैं तेरी ।
सुलझा लें गुत्थी, सदियों से, अनसुलझी हैं बहुतेरी ।
आज नहीं, तो कभी नहीं, कल फिर हो जायेगी देरी ।
क्या तेरे आराध्य देव का, एक नाम, 'अखिलेश' नहीं ।
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किंचित भी क्लेश नहीं ॥
No comments:
Post a Comment