कविता - प्यारे किस के लिये लिखते हो

 तुम लिखते हो, में पढता हूँ, मैं कहता हूँ, तुम सुनते हो ।
मुझसे मेरा अन्तस पूछे, प्यारे किस के लिये लिखते हो ॥
 
कौन करेगा मूल्यांकन, इस परिश्रम का, जो मात्र अकिंचन ।
कौन करेगा बैठ के पल भर, लिखी हैं उन बातों पे चिन्तन ।
किसको है फुर्सत, जो आ कर, बात तुम्हारे मन की पूछे ।
सुने, समझ कर, समझाने को, फिरता डोले कूचे – कूचे ॥
 
थोड़ा सा भी वक्त मिले तो, आपस मैं होती हैं बातें ।
कैसे दिन गुजरे हैं तेरे, कैसे काटीं मैं ने रातें ।
आगे बात बढे तब तक तो, रात गुजर जाती है सहसा ।
हाल सुबह का रातों जैसा, फिर रातों का वही सुबह सा ॥
 
ऐसे में क्या खाक सुनेगा, आम आदमी बात तुम्हारी ।
सब को छोड़ो, खुद की सोचो, मानो जो तुम बात हमारी ।
इतनी सीधी सच्ची बात, बताने पर ही जान सका मैं ।
अपनी और जमाने भर की, सूरत को पहचान सका मैं ॥
 
सत्य! अकिंचन श्रम है मेरा, सत्य! न है कोई अभिलाषा ।
अभिलाषा तो बस इतनी है, जन जन में जागे जिज्ञासा ।
पूछे हर कोई खुद से, वो जीता है - क्यों जीता है ।
गुस्सा क्यों खा जाता है, और अश्कों को क्यों पीता है ॥
 
उसको क्यों मालूम नहीं है, मानव की पहचान है क्या ।
जड़ है क्या, चेतन है क्या, ये जिस्म है क्या और जान है क्या ।
कुदरत से क्यों दूर दूर है, कृत्रिमता का दीवाना ।
अपने ही घर के अन्दर वो, आज हु आ क्यों बेगाना ॥
 
उसको क्यों मालूम नहीं हैं, अपने फर्ज औ अपने हक ।
कदम बढाने से पहले ही, आखिर क्यों जाता है थक ।
खोई खोई आखें, उखड़ी सांसें, बिखरे सपने क्यों ।
नास्तिक भी आफत आने पर, लगे राम को जपने क्यों ॥
 
सार्वभौम है यदि मनुष्य, तो ईश्वर का आराधन क्यों ।
वैज्ञानिक युग में भी, एक पहेली है ये जीवन क्यों ।
तन तो बहुत तराशा हमने, लेकिन मन संकीर्ण रहा ।
मानव का मानस मन्दिर, बस जीर्ण रहा और शीर्ण रहा ॥
 
आधी - आधी बात, तुम्हारी समझ नहीं आती हैं ना?
आओ फिर से बन जायें, कुछ पल को हम तोता मैना ।
खुद से खुद के बारे में, कुछ खुल कर चर्चा आज करें ।
अद्यतन - पुरातन, मसलों - सिद्धान्तों पर चर्चा आज करें ॥
 
आपस में अपना ज्ञान परस्पर बाँट, बनें हम विज्ञानी ।
मंशा अपनी है यही फकत, हठ कहो इसे, या मनमानी ॥

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