छन्द - सत्तर-अस्सी के दशक वाली होली

कहाँ गईं वे मस्तियाँ, कहाँ गई वह मौज
वे केशर की क्यारियाँ, गोबर वाले हौज
गोबर वाले हौज बीच डुबकी लगवाना
मेसू, मठरी, खीर’मोन के थाल उड़ाना
बतला तो ऐ यार जमाने कहाँ गईं वे
खुशियों की सौगात न जाने कहाँ गईं वे
 
फिसल न जावें तो अभी और दिखावें सीन  
साडी पहने घूमते मिस्टर अल्लादीन
मिस्टर अल्लादीन गुलाबो बन कर डोलें
कभी चुराते नैन कभी घूँघट को खोलें
इस दहशत से हाथ पीठ पीछे चिपकावें
ताकि वक्ष पर टिकीं कन्दुकें फिसल न जावें
 
रंग लगे है जिस घडी, हाल होय बेहाल
फागुन आते ही सजन, दिल की बदले चाल
दिल की बदले चाल, काटता डोले कन्नी
काँटा लगे गुलाब चवन्नी लगे अठन्नी
फागुन में तो रंग यार इस तरह चढ़े है
बिना भंग भी अंग-अंग खुस-रंग लगे है
 
होली के त्यौहार की, बड़ी अनोखी रीत
मुँह काला करते हुये जतलाते हैं प्रीत
जतलाते हैं प्रीत, गालियों को गा-गा कर
लेकिन अपने साथ सभी को हँसा-हँसा कर
करते हैं दिन रात इस तरह हँसी-ठिठोली
होली भी कह पड़े बस करो हो ली हो ली

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