काहु कों बाँध्यौ नहीं जग आपु हि प्रीत की डोर सों आय बँध्यौ है
हाथ’न हाथ खरीदौ गयौ चितचोर
सखी बिन मोल बिक्यौ है
नित्य नवीन विधी हिय हार सनेहि’न कौ मन जीत लयौ है
कारे पै काहू कौ रंग चढ्यौ नहिं कारे के रंग’न विश्व रँग्यौ है
फागुन मास बड़ौ बदमास अकास उसास में आग लगावै
धीर धरें नहिं देत धरा औ समीर हु स्यांप’न सौ सतरावै
नित्य नवीन उमंग जगाय रती कौ पती मेरौ चित्त चुरावै
कौन दिना समझौगे अहो पिय नैन मिले बिन चैन न आवै
काज तौ खाक भयौ महाराज यै कैसी उचंग में जाय फँसे हौ
काहु खदान में जाय फँसे हौ कि काहू सुरंग में जाय फँसे हौ
नित्य नवीन बहाने बनात कहूँ हुड़दंग में जाय फँसे हौ
नित्य नवीन विधी हिय हार सनेहि’न कौ मन जीत लयौ है
कारे पै काहू कौ रंग चढ्यौ नहिं कारे के रंग’न विश्व रँग्यौ है
फागुन मास बड़ौ बदमास अकास उसास में आग लगावै
धीर धरें नहिं देत धरा औ समीर हु स्यांप’न सौ सतरावै
नित्य नवीन उमंग जगाय रती कौ पती मेरौ चित्त चुरावै
कौन दिना समझौगे अहो पिय नैन मिले बिन चैन न आवै
काज तौ खाक भयौ महाराज यै कैसी उचंग में जाय फँसे हौ
काहु खदान में जाय फँसे हौ कि काहू सुरंग में जाय फँसे हौ
नित्य नवीन बहाने बनात कहूँ हुड़दंग में जाय फँसे हौ
या बजमारी, पजारी, मरी काहू सौतन संग में जाय फँसे हौ
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