गीत - शरद पूर्णिमा

 नभ रोशन, अंतर्मन रोशन, कण-कण है सुखदायी ।
लिये सँदेशा दीवाली का, शरद पूर्णिमा आयी ।।
 
कुछ गरमी, कुछ सर्दी जैसा, मौसम लगे सुहाना ।
यही सार जीवन का प्यारे, सुख-दुःख साथ निभाना ।
कष्टों की कलियों का सौरभ होता है फलदायी ।।
लिये सँदेशा दीवाली का, शरद पूर्णिमा आयी ।।
 
बम्ब-पटाखे, लड्डू-बर्फी, खील-बताशे लाना ।
अगर कहीं हटरी मिल जाये, ला कर उसे सजाना ।
पीढ़ी दर पीढ़ी हटरी ही सुख सहेजती आयी ।।
लिये सँदेशा दीवाली का, शरद पूर्णिमा आयी ।।
 
नये-नये कपडे सिलवाना, करना साफ सफाई ।
घर के बड़े बुजुर्गों के सँग, पर्व मनाना भाई ।
जिसने भी खुश रखा बड़ों को, खुशी उसी ने पायी ।।
लिये सँदेशा दीवाली का, शरद पूर्णिमा आयी ।।
 
धनतेरस के दिन कुछ नूतन, घर में ले कर आना ।
दीवाली को लक्ष्मी-पूजा कर के दीप जलाना ।
तदुपरान्त वह सब करना तुम रीति चली जो आयी ।।
लिये सँदेशा दीवाली का, शरद पूर्णिमा आयी ।।
 
हाथ जोड़ फिर लक्ष्मी माँ से, यही माँगना प्यारे ।
सब जग में जगमग हो जाये, दूर होंय अँधियारे ।
नहीं भूलना उस संस्कृति को, जिसका जग अनुयायी ।।
लिये सँदेशा दीवाली का, शरद पूर्णिमा आयी ।।

No comments:

Post a Comment