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कविता - कुकर की सीटी

 कुकर से गैस
रिस रही थी हौले-हौले
बीच-बीच में
सुनाई भी पड़ रही थी
सीटी की आवाज
उस की परिसीमाओं की आगाही
मगर सुना नहीं किसी ने

कविता - बरगद – वटवृक्ष

 यूँही नहीं बने हमारे संस्कार
कुछ न कुछ तो है हर रीति रिवाज के पीछे
जरूरत है उन्हें समझने की

कविता - पेड़ और पर्यावरण

कटते जा रहे हैं पेड़ पीढी दर पीढी
बढता जा रहा है धुआँ सीढी दर सीढी
अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये,
चिन्तित है कागजी समुदाय

कविता - करवा चौथ

 बदलता संसार, बदलता व्यवहार
बदलते सरोकार, बदलते संस्कार
बदलते लोग, बदलते योग
बदलते समीकरण, बदलते अनुकरण
बदलता सब कुछ
पर नहीं बदलता

कविता - कलम के सिपाही, मुंशी प्रेमचन्द

 क़लम के जादूगर!
अच्छा है आज आप नहीं हैं
अगर होते, तो, बहुत दुखी होते
 
आप ने तो कहा था -

कविता - कंक्रीटीकरण

 खेतों को काट के इमारतें
बनती ही जा रही हैं
जहाँ देखो –बेइन्तेहा तनती ही जा रही हैं
 
चिन्ता होती है
अगर कोन्क्रीट के ये जंगल युंही फैलते जायेंगे

कविता - ऊँट एक योजनाकार

 यों तो ऊँट
एक बुद्धिमान योजनाकार है
जो रेगिस्तान की गरमी से बचने के लिये
अपने पेट की पोटली में पानी भर के रखता है
और जब उसे प्यास लगती है

कविता - मैं और हवा

 मैंने हवा को महसूस किया -
शून्य को सम्पन्न बनाते हुए,
सरहदों के फासले मिटाते हुए,
खुशबुओं को पंख लगाते हुए,
आवाज की दुनिया सजाते हुए,
बिना कहीं भी ठहरे, यायावर जीवन बिताते हुए,
और फिर मुझे खुद पर तरस आया.
 
मैं - यानि कि एक आदम जात,

कविता - प्रेम शांति का द्वार बने

 कुछ अपनी कुछ औरों की । बातें कलियों-भँवरों की ।
तन आकुल औ व्याकुल मन । राम कहानी सा जीवन ॥
 
इश्क मुहब्बत की बातें । कम पड़तीं जिन को रातें ।
दिल का मर्ज अनोखा है । फिर भी लगता चोखा है ॥

कविता - नीम

 रंग-त्वचा को परिभाषित कर नाहक स्वाद चखाऊँ क्या
हर टहनी में कितनी पत्ती होती हैं गिनवाऊँ क्या
किस मौसम का इस पर कैसा असर पड़े बतलाऊँ क्या
यार सैंकड़ों गुण हों जिस में उस की गाथा गाऊँ क्या

कविता - हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ

 ये शोरगुल बेइन्तिहा दम घोंटता धुआँ
हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ
 
उस गाँव की मिट्टी में कीटाणु घने दिखे
इस वासते हम ने शहर के फैसले लिखे

कविता - हमें उम्र भर मम्मी पापा के सँग में ही रहना है

 प्यारी प्यारी मम्मी जब भी अपनी धुन में आती थी
गोदी में ले कर के हमको ट्विंकल ट्विंकल गाती थी
गोल गोल रसगुल्ले जैसे गालों को सहलाती थी
पकड़ हमारी नक्को रानी हँसती और हँसाती थी

कविता - कड़ी दिवाली दरवाजे पर

 सावन बीता भादों बीता, क्वार मास भी जाए रीता
खड़ी दिवाली दरवाज़े पर, सजना तुम कब आओगे घर
 
दिल, दीपक सा जलता पल-छिन, राह तकूँ तारीख़ें गिन-गिन
जल्दी आऊँगा दोबारा, सन्देशा था यही तुम्हारा

कविता - मैं मैं मैं

 मैं मैं मैं
ये बकरी वाली 'मैं-मैं' नहीं है
 
ये वह 'मैं' है
जो आदमी को शेर से बकरी बना देती है

कविता - प्यारे किस के लिये लिखते हो

 तुम लिखते हो, में पढता हूँ, मैं कहता हूँ, तुम सुनते हो ।
मुझसे मेरा अन्तस पूछे, प्यारे किस के लिये लिखते हो ॥