कविता - हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ

 ये शोरगुल बेइन्तिहा दम घोंटता धुआँ
हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ
 
उस गाँव की मिट्टी में कीटाणु घने दिखे
इस वासते हम ने शहर के फैसले लिखे
अब शहर खुद गर्दिश का मारा माँगे है पनाह
हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ
 
खूराक ऐसी थी कि जंगल तक पचा गये
कुछ घास बच गयी थी हम उस को भी खा गये
ओजोन से बचने की अब सूझे न कोई राह
हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ
 
इक बन्द रासते पे रख चुके हैं हम कदम
ये सब जहाँ न हों वहाँ जी पायेंगे न हम
अब लौटना मुमकिन नहीं चलना भी है गुनाह
हम छोड़ कर जायें जहाँ, तो जायें भी कहाँ

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