नवगीत - मजदूरी का मोल

 मजदूरी का मोल
यहाँ अधिक, पर
वहाँ लगे कम
ये कैसा है झोल
ओ भैया ये कैसा है झोल
 
कस्बों में रिक्शे वाले
पाँवों से रिक्शे हाँक रहे
सर पे तपती धूप
बदन के हर हिस्से से स्वेद बहे
ढो कर हम को एक मील
दस-बीस रुपल्ली मात्र गहे
गमछे से फिर पौंछ पसीना
मुँह से मीठे बोल कहे
उस पर हम तन कर उस से
बोलें बस कड़वे बोल
ओ भैया ये कैसा है झोल
 
ऑटो - टेक्सी वालों के
दिन-दूने नखरे क्या बोलें
मन में हो तो आवें
मन में ना हो तो - फट ना बोलें
लें समान की अलग मजूरी
जो चाहें जैसा बोलें
उस पर हम डरते डरते
उनको ड्राईवर भैया बोलें
जो मांगें खामोशी से
दे देते हैं दिल खोल ... ओ भैया ये कैसा है झोल

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